पर सिद्धांत अब भी कहीं जिंदा हैं

ज़िंदगी बन चुकी खेल है नकाबों का
रोशनी नाम है बुझे हुए चिरागों का

ज़मीर ज़ुबान गुज़रे वक्त की बातें हैं
सच्चाई इंसानियत नाम है किताबों का

यूँ तो हर शख्स यहाँ खानदानी है
असूल नाम है छेद हुए जहाजों का

नहीं कह सकते औलाद तक से अपनी
सवाल ही जवाब है आपके सवालों का

खुदगर्ज़ी कश्ती में मतलब के मोती भरते हैं
पहना हर कोई गले में हार जवाबों का

दर्द में निकली अमित कविता कौन सुनेगा
जब मसला बड़ा है छपने और ख़िताबों का

युवराज़ अमित प्रताप 77
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