प्यार की रहगुज़र पर चलोगे अगर तो मज़ा आएगा

++ग़ज़ल++(212 212 212 212 212 212 212 212 )
ऐ मेरे हमसफ़र प्यार की रहगुज़र पर चलोगे अगर तो मज़ा आएगा
रास्ता पुरख़तर और मुश्किल मगर जीत के देखो डर तो मज़ा आएगा
***
आप अपने ही दिल का कहा मानिये लोग क्या कह रहे गौर मत कीजिये
आपकी शर्त पर तय करें आप गर ज़िंदगी का सफ़र तो मज़ा आएगा
***
सीख लें आप पहले सलीका सही जाम भर भर के पीना तो अच्छा नहीं
पीजिये जाने-मन आप मै को अगर मुख़्तसर मुख़्तसर तो मज़ा आएगा
***
वक़्त थोड़ा निकालें किसी गैर को इल्म कोई सिखाएं जो ख़ुद जानते
एक अनजान की आपके हाथों गर ज़ीस्त जाती सँवर तो मज़ा आएगा
***
हो गया ज़िंदगी में है आसाँ अगर मंज़िलों का सफ़र लुत्फ़ आता नहीं
मंज़िलों के लिए खूँ-पसीना अगर तू बहाता बशर तो मज़ा आएगा
***
वस्ल की रात आई मुरादों भरी आज कर दो बयाँ हाल दिल के सभी
आपका साथ हो रात जाये ठहर और छिपा हो क़मर तो मज़ा आएगा
***
ग़म की होती हमेशा है शब मुख़्तसर ग़म भले कम हो लेकिन दिखाता है डर
आएगी ज़ीस्त में जब ख़ुशी की सहर होंगे ग़म बे-असर तो मज़ा आएगा
***
आप मानें न मानें है सच बात ये सोचते आप जो हो वही ज़ीस्त में
इसलिए सोचिये अच्छा ही उम्र भर मत करें फिक्र गर तो मज़ा आएगा
***
ये तजुर्बा मेरा सच लगा इसलिए आप सब से मेरी इल्तज़ा है ‘तुरंत’
कह रहें हैं ग़ज़ल जो अभी बेबहर गर कहें बा-बहर तो मज़ा आएगा
***
गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी

         

Share: