फैसले जिनके कड़े हैं आजकल

ग़ज़ल
फैसले जिनके कड़े हैं आजकल,
उनके ही झंडे गड़े हैं आजकल।

शीश महलों में कहाँ रहता कोई,
अब कहाँ हीरे जड़े हैं आजकल।

कलतलक रहते थे जो मसनदनशीं,
वो ज़मीं पर गिर पड़े हैं आजकल।

आग नफ़रत की लगाने के लिए,
लोग कितने ही अड़े हैं आजकल।

बाग़ के क़ातिल बनेंगे एक दिन,
पेड़ जो सीधे खड़े हैं आजकल।

कलतलक फुरसत न थी जिनको मियां,
अस्पतालों में पड़े हैं आजकल।

बेच खाई सबने है शर्मोहया,
सारे ही चिकने घड़े हैं आजकल।

सह सके सारे ही जो जुल्मोसितम,
जिंदगी में वो बड़े हैं आजकल।

डर जिन्हें ऊंचाइयों से था ‘मिलन’,
वो जमीं पर फिर खड़े हैं आजकल।

——मिलन ‘साहिब’।

         

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