“बचा क्या है…?”

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किसे मालूम सर पर उसके आज क्या-क्या है ?
पुरखों से मिला बहुत कर्जा और बचा क्या है ?
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रो-रो कर सूख गयी है नदी इन आँखों की ,
और अब भी पूछते हो ग़म का पता क्या है ?
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जिससे भी मिलता हूँ , मुस्कुराकर मिलता हूँ ,
जान लो तुम अपना बनाने की दवा क्या है ?
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मनुष्य जन्म का मिलना सौभाग्य नहीं  है क्या ?
फिर क्यों कहते हो अब तक हमको मिला क्या है ?
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बोते रहे बबूल हमेशा , मिला नहीं आम ?
फिर भी समझे नहीं आखिर माज़रा क्या है ?
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जिसकी रहमत से अब तलक बचते हैं आये ,
निराधार है फिर ये पूछना कि ख़ुदा क्या है ?
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आसां नहीं देख अंदाज़ा लगाना “कृष्णा”,
कि किसी के ये शातिर दिमाग़ में भरा क्या है ?
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— °•K.S. PATEL•°
( 22/05/2018 )

         

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