“बड़ी देर कर दी आने में”…

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इक ख़त का मज़ा मोबाईल ने छीन लिया अनजाने में ।
ये कैसा वक़्त है , देर न लगा पुराने दिन भुलाने में ।
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कमरे के अंदर बारिश का सबूत तो नहीं माँगा करो ,
कभी जाकर देखा है अश्क़ों से भीगे हुए सिरहाने में ।
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क्या ख़ूब दोस्ती थी पहले , अब बहुत ब्यस्तता है आजकल ,
अब सुनाई कहाँ देता है , बड़ी देर कर दी आने में ?
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दिल में दस्तक देने का सिलसिला बरकरार है कहाँ ?
एक संकोच से परहेज हो गया हर बात सुनाने में ।
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कोई रूठा है तो रूठा ही रह गया है अक्सर इधर ,
मिन्नतों के दौरां अहंकार आता है अब मनाने में ।
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दौलत ही राज कर रहा है , इश्क़ की गलियों में आजकल ,
सच्चा प्यार सिमट के रह गया है इधर बस अफ़साने में ।
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इतना बदलाव देखकर कभी-कभी ये लगता है “कृष्णा”,
आखिरकार क्या कर रहें हैं , हम रूककर इस ज़माने में ?
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— °• K.S. PATEL•°
( 12/06/18 )

         

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