“बदनाम है”…

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चलना आया अच्छे से नहीं और सफ़र बदनाम है ।
डूबने वालों के दरम्यां अक्सर लहर बदनाम है ।
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मौसम के अनुसार ढलने का सलीका नहीं आया ,
फिज़ूल में सुबह-शाम और ये दोपहर बदनाम है ।
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क़सूर हमेशा दिल का ही होता है इश्क़ में मगर ,
क़ातिल है नहीं फिर भी बेचारी नज़र बदनाम है ।
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न जाने क्या-क्या दिमाग़ में उपज रहे खुरापातियाँ ?
सोच अच्छी दिखती नहीं , बेचारा ख़बर बदनाम है ।
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न जाने वो क्या वज़ह रही कि खुल नहीं पाये ये लब ,
होगी शायद कोई मज़बूरी मगर अधर बदनाम है ।
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अच्छी-खासी आबो-हवा गाँवों की वो छोड़ आये ,
अब पता चला कि प्रदूषण के लिए शहर बदनाम है ।
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तीखी-कड़वी ज़ुबां ज़िंदगी खत्म करने पे है तुली ,
और “कृष्णा” बेवज़ह आजकल ये ज़हर बदनाम है ।
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— °•K S. PATEL•°
( 15/04/2019 )

         

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