बशर पे रब जो कभी मेहरबान होता है

++ग़ज़ल ++(१२१२ ११२२ ११२२ २२/११२ )
बशर पे रब जो कभी मेहरबान होता है
दिलों में प्यार का जज़्बा जवान होता है
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छुपा है भेड़िया इंसान में पता किसको
किसी के रुख़ पे न कोई निशान होता है
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कली चमन में है महफ़ूज़ क्यों नहीं अब तक
सवाल सुन के दुखी बाग़बान होता है
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शिकार हो के ही रहता बशर है ऐबों का
वही बचे जो बहुत सख़्त-जान होता है
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उसे पडेगा ही पछताना ज़ीस्त में जिसको
बिना ही बात के ख़ुद पर गुमान होता है
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ज़रा सा थाम ले जो सब्र का बशर दामन
तो मुश्किलों का हमेशा निदान होता है
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उफ़ुक़ जमीं का फ़लक़ से मिलन दिखाता मगर
कभी ज़मीं पे भी क्या आसमान होता है
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कलाम मेरे न तोलें किसी तराजू पर
कद-ए-अदब न सभी का समान होता है
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रदीफ़ अब नए अपने तलाश कीजै ‘तुरंत ‘
ज़मीँ को जोतने वाला किसान होता है
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘बीकानेरी
११/०६/२०१९
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शब्दार्थ – उफ़ुक़ =क्षितिज ,फ़लक़=आकाश
क़द-ए-अदब=साहित्य की ऊंचाई

         

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