बात जबसे मैं कहने लगा था खरी

ले रही ये अजब इम्तिहाँ मुफ़लिसी l
भूख जितनी दबाई, ये उतनी बढ़ी ll

ज़िन्दगी आ गई इक अजब मोड़ पर,
अब मुक़द्दर मेरा तिश्नगी-तिश्नगी l

सिर्फ इतना वसीयत में उसने लिखा,
जान भी आपकी, रूह भी आपकी l

बाँट देंगे भला कैसे धरती-गगन,
हो गया क्या खुदा से बड़ा आदमी l

ख़ुद-ब-ख़ुद हो गईं दूरियाँ दरमियाँ,
बात जबसे मैं कहने लगा था खरी l

– सुनील गुप्त ‘विचित्र’

         

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