बेचैन जवानी है

सदियों है पढ़ी जाती होती न पुरानी है l
मज़दूर पसीने से लिखता जो कहानी है ll

मुश्किल उसे राहों की लगती है खिलौनों सी,
खुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है l

आकाश को बाँहों में भर लेगा यकीनन वो,
आकाश को छूने की उम्मीद जगानी है l

अपनी ही तो थीं खुशियाँ कुछ देर को रूठी थीं,
अब घर से न जायेंगी खुशियों ने ये ठानी है l

सूरत ये बदलने के हालात नज़र आते,
उखड़ा सा ये आलम है बेचैन जवानी है l

– सुनील गुप्त ‘विचित्र’

         

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