भटक मत जाना

दिल में एहसास के शोलों का भड़कना वाजिब

रूह के साथ है दिल का भी सुलगना वाजिब

दर्द से मुँह को कलेजा जो कभी आ जाये
फिर तो होता तिरा आँख छलकना वाजिब

दर्द-ओ-ग़म इतने कहाँ तक तू समेटेगी भला
ज़िंदगी टूट के तेरा है बिखरना वाजिब

आज तक झूटी तसल्ली से उन्हें बहलाया
मेरे बच्चों पे मगर अब है खिलौना वाजिब

ऐश-ओ-इशरत के ज़माने में भटक मत जाना
ऐसे हालात में होता है सँभलना वाजिब

तल्ख़ लहजे से नहीं, बात करो नरमी से
ताकि पत्थर का भी हो जाये पिघलना वाजिब

अज़्म-ए-कामिल लिए चल बैठ ना जा थक कर तू
तेरा मंज़िल की तरफ़ साद है चलना वाजिब

अरशद साद रूदौलवी

         

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