भाई से लङाई

एक होना ही पड़ा कितनी लड़ाई लड़ता
उम्र-भर कैसे भला भाई से भाई लड़ता

यह तो अच्छा हुआ काम आयीं दलीलें मेरी
वरना देकर वो मुझे झूटी सफ़ाई लड़ता

इस को आज़ादी थी प्यारी तो क़फ़स तोड़ दिया
क़ैद में क्यों ना रिहाई की लड़ाई लड़ता

रब ने डाली है मुहब्बत भी दिलों में वरना
दे के इन्सान ही इंसां को दुहाई लड़ता

सर को ख़म कर के निभाता हूँ हर इक रिश्ता में
कैसे अपनों से जुदाई की लड़ाई लड़ता

दिल में जज़्बा है भलाई का भी इन्सानों में
साद होती जो कहीं सिर्फ बुराई लड़ता

अरशद साद रूदौलवी:

         

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