“मंज़िल से नहीं”…

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नाखुशी कर्मों से ही होनी चाहिए , मंज़िल से नहीं ।
और नाराज़गी शब्दों से होनी चाहिए , दिल से नहीं ।
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कोई साहसी है तो ज़रा तारीफ़ कर दो उस शख़्स का ,
मुहब्बत उसके निजी साहस से है , किसी बुज़दिल से नहीं ।
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कोई हरकत दिखाओ तो कैसे रहोगे नाका़बिल तुम ?
नफ़रत सभी बेरोज़गारों से है , किसी क़ाबिल से नहीं ।
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गलती अब तो पूरे माहौल की है सोचकर देखो तो ,
पछतावा हर इक माहौल से है , कोई क़ातिल से नहीं ।
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जो कमाया गया है धन , क्या ऊपर ले जाना मुमक़िन है ?
तकलीफ़ तो हर इक कंजूस से है , किसी दरियादिल से नहीं ।
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दूर-दूर रहोगे तो प्यार भला किधर से मिल पायेगा ?
रूसवाई ग़ैरों से है , मेरी रूह में शामिल से नहीं ।
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हर वक़्त वाकई होता क्यों नहीं एक जैसा “कृष्णा” ?
मुझे तो गुस्सा हर तूफ़ान से है , किसी साहिल से नहीं ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 30/05/2018 )

         

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