“माँ”…

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हृदय पे हमेशा इक अमिट निशाँ होती है ।
माँ तो हर दिल की धड़कन और जाँ होती है ।
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सभी जगह ढूँढकर देख लो शायद ही मिले ,
ममता की खूशबू हर जगह कहाँ होती है ?
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माँ की आँचल सिर पे है तो डर किस बात का ?
इस आँचल में ही हर हसरत जवाँ होती है ।
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मन की थाह लेने की कोई ज़रूरत नहीं ?
इनका मन पाक़-साफ आबे-रवाँ * होती है ।
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चाहे लाख आँधियाँ आ जाये हर सफ़र में ,
लबों पे मुस्कुराहट इस दरमियाँ होती है ।
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किस्मत के बंद ताले खुल जाते हैं अक्सर ,
माँ की भावनाओं की क़दर जहाँ होती है ।
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ये जो माँ की मोहब्बत होती है न “कृष्णा” ,
तमाम मोहब्बतों की असली माँ होती है ।
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* आबे-रवाँ = बहता पानी
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— °•K.S. PATEL•°
( 13/05/2018 )

         

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