“मान भी जा”…

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2212 2122 2212 2122
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मेरा कहा आज मेरे हमदम आ मान भी जा ।
इस तरह ख़ुद का तमाशा तो मत बना मान भी जा ।
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घर से निकलकर कहीं जाओ तो कभी भूलना मत ,
संबंध में घुल चुका ज़हरीला हवा मान भी जा ।
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कुछ ज्ञान की बात लेकर ज्ञानी नहीं हो गये तुम ?
अक्सर रहा है घमंडी का सिर झुका मान भी जा ।
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ग़म है कहीं तो कहीं पर बेहद खुशी भी मिलेगी ,
नादान होकर अभी साँसें मत छुड़ा मान भी जा ।
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अनुचित करम छोड़कर देखो , ठीक इंसां बनोगे ,
क्या समय है देखकर हरकत हो ज़रा मान भी जा ।
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सपना खुली आँख से देखो , जीत हर कदम में है ,
बेवज़ह दिल को स्वयं यूं तो मत जला मान भी जा ।
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जो अगर मन की खुशी पाना हो , ज़रा सोच दिल से ,
हर बात में झगड़ना मत “कृष्णा”, कहा मान भी जा ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 10/04/2018 )

         

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