“माया की संसार है…”

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संसार का माया है या माया की संसार है ?
समझना तो ज़रूरी यहाँ , लीला अपरंपार है ।
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कुछ वज़ह से ये शब्द भी कभी खामोश हो जाते ,
तो कहीं खामोशियों को बोलने का अधिकार है ।
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खुशी उधार की है या फिर उधारी में मिली खुशी ?
माँगने जाओ तब लगता बड़ा ज़ालिम उधार है ।
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साथ-साथ होते हुए भी अकेलापन कुछ ठीक नहीं ,
तन्हा रह कोई दिल में रखा , ये अच्छा व्यवहार है ।
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कोई क़रीब रह दूर होता , अविश्वास के कारण ,
कोई दूर रहकर , यक़ीन कर पा जाता प्यार है ।
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पराये में भी कुछ तो बन ही जाते हैं अपने ,
अखरे , अपनों में पराये होने की भरमार है ।
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आईने में चेहरे दिखते , दिखे नहीं है अक़्स ?
आज अक़्स को आईना बनाने की दरकार है ।
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गौर से देखो तो लगता है , संसार इक मेला ,
मगर चिंतन पर पाया , मेले का संसार है ।
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जीतकर हारना , ज़िंदगी में आम बात है “कृष्णा”,
पर हारकर जीतने का ज़ज़्बा खूब असरदार है ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 27/02/2019 )

         

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