मिटा दो अंधेरा…

अयाँ  से  ड़रो  ना  क़ज़ा से
डरो  सिर्फ  अपने  ख़ुदा से
जो  थे  बेवफ़ा़  इब्तिदा  से
पशेमां  हैं   मेरी   वफा    से
सफर  में  रखो  नेक नीयत
बचो  राह  की  बद्हवा   से
जो तक़लीफ़ दे  दूसरों  को
कहो कुछ ना ऐसा ज़ुबाँ से
दिलेरी  से  हो  पार   दरिया
सफीने  से   ना  बादबाँ   से
बहारों का मौसम है अगला
न घबराओ प्यारे ख़िज़ाँ से
करो  ‘दीप’  ऐसा   उजाला
मिटा  दो  अंधेरा  जहाँ   से
भरत दीप

         

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