मुफ़लिसी के गीत गाना छोड़ दे

बेसबब बातें बनाना छोड़ दे l
चाँद का डोला सजाना छोड़ दे ll

रोटियाँ मेहनत से ही मिलती यहाँ,
मुफ़लिसी के गीत गाना छोड़ दे l

हौसलों की बंदगी कर तू सदा,
मुश्किलें अपनी गिनाना छोड़ दे l

उठ गले लग फिर बुलाती ज़िन्दगी,
यह दुखों का शामियाना छोड़ दे l

बाजुओं पर कर जरा अपने यकीं,
दर-ब-दर यूँ सर झुकाना छोड़ दे l

इश्क़ में जायज़ हैं कुछ गुस्ताखियाँ,
इस तरह से मुँह फुलाना छोड़ दे l

देखने हैं कुछ नये से ख़्वाब भी,
अब मेरी यादों में आना छोड़ दे l

राम जी का बाण है उसकी नज़र,
है नहीं मुमकिन निशाना छोड़ दे l

@ सुनील गुप्त ‘विचित्र’

         

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