“याद क्यों करते हैं”…

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याद क्यों करते हैं विपत्ति में ही भगवान को ?
भूल जाते हैं क्यों सदा अपने इम्तिहान को ?
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काम कोई ऐसा करना ज़रूरी है भला कि ,
बार-बार छुपानी पड़ती ख़ुद की पहचान को ?
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बेशक कभी हर अहसास दिखते थे यहीं-कहीं ,
मगर अभी अहं जर्जर कर गया सभी मकान को ।
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स्वार्थ के तिलस्म से बच पाना अभी नामुमकिन ,
पल में बदलते देखो आजकल के बयान को ।
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आदमी का बढ़ता ही जा रहा है वहशीपन ,
हर परिवार तरसने लगा है इक मुस्कान को ।
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विकृत मानसिकता की बढ़ती जा रही घटना ,
कौन रोके इकतरफ़ा चाहत के तूफ़ान को ?
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बेतहाशा कब्जा करते ये ज़मीं के दलाल ,
आशियां बनायेंगे क्या , अब हम आसमान को ?
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ये गिरगिट आजकल बहुत ही उदास रहते हैं ,
उससे ज्यादा रंग बदलते देख इंसान को ।
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किसी को चाही मंज़िल क्या ख़ाक़ मिल पायेगी ?
शुरू में ही रूक गये देख अपनी थकान को ।
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पूरी ज़िंदगी ऐशो व आराम में गुजर गयी ,
अब क्यूँ पछताते हो , देख उमर के ढलान को ?
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झूठ की यहाँ पर बिसात ही क्या सुन ऐ “कृष्णा”,
अगर कोई लगाम कसे , ख़ुद अपनी ज़ुबान को ?
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