“ये कैसी तक़रार है…?”

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बात कोई समझे नहीं , ये कैसी तक़रार है ?
नादानी है और अपना-अपना अहंकार है ।
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माना कि मुश्किल है आपस में समझौता करना ,
मगर झुकने में ही फलता औ फूलता प्यार है ।
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चार बर्तन होंगे तो कुछ आवाज निकलेगी ही ,
जानना बस ज़रूरी है , किसका क्या अधिकार है ?
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एक-दूजे को समझेंगे तो सफ़र सुखद होगा ,
वरना रिश्ता लगने लगेगा एक व्यापार है ।
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पालक ही जब लड़ें फिर बच्चे कैसे संभले ?
ऐसे में नौनिहालों का भविष्य अंधकार है ।
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उम्र बीत जायेगी मगर साथ कभी न छूटेगा ,
सच जिस जोड़ी ने बदल लिया अपना व्यवहार है ।
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औ कभी भी तक़रार अब नहीं होगी ऐ “कृष्णा”,
जान जाये जो करीबी ही पूरा संसार है ।
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