“ये कैसी शरारत है…?”

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दुनिया में हर किसी को हर किसी से कुछ न कुछ शिकायत है ।
भूल जाते मगर ये ख़ुद की दूसरों पे क्या इनायत है ।
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दूसरों को परेशां करके बहुत ज्यादा आता है मज़ा ,
आत्म-संतुष्टि के लिए सोचो ये कैसी शरारत है ?
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सच्चा प्यार चिराग़ लेकर ढूँढों तो भी मिलता है कहाँ ?
मुहब्बत की सही परिभाषा आजकल मानो तिज़ारत है ।
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न जाने किस आबो-हवा से रिश्ते कलंकित होने लगे ?
घर के अंदर भी खतरा , कहीं खो गई इधर हिफ़ाज़त है ।
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सब्र का इम्तिहान नारी का अब तो मत लेना ऐ पुरूष ,
वरना नज़ाक़त को भूलकर कहोगे तुम क्या क़यामत है ।
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अच्छी सोच के साथ जीने में ही सार्थक है ये ज़िंदगी ,
इसके अभाव में तन-मन जान लो एक जर्जर इमारत है ।
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अच्छा-बुरा जो भी दिखता है यहाँ , लिख लेता है “कृष्णा”,
सच कहें तो इस कलम को चुप रहने की नहीं इज़ाज़त है ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 19/11/2018 )

         

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