रंज-ओ-ग़म हो न अगर आँखें कभी रोती क्या ?

++ग़ज़ल++(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )
रंज-ओ-ग़म हो न अगर आँखें कभी रोती क्या ?
बेसबब साहिल-ए-मिज़गाँ पे नमी होती क्या ?
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ज़ख़्म ख़ुद साफ़ करें और लगाएं मरहम
ज़ख़्म क़ुदरत किसी के ज़िंदगी में धोती क्या ?
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चन्द लोगों के नसीबों में लिखे ग़म ही ग़म
ज़ीस्त सबकी ग़मों का बोझ कभी ढोती क्या ?
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बाग़बाँ फ़र्ज़ निभाता जो तू मुस्तैदी से
तो कली बाग़ की अस्मत को कभी खोती क्या ?
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क्यों किनारे पे कई बार सफ़ीने डूबे
इस तरह रब कभी क़िस्मत किसी की सोती क्या ?
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एक अहसास को कुछ लोग बयाँ करते यूँ –
“इश्क़ पत्थर की ज़मीँ है” किसी ने जोती क्या ?
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बीज अगर चैन-ओ-सुकूँ के नहीं बाज़ारों में
ज़िंदगी ग़म के बियाबाँ में भला बोती क्या ?
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ख़ौफ़ आँखों में तेरी डूबने का है लेकिन
किसी जोख़िम के बिना मिलते कभी मोती क्या ?
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खोद कितनी भी क़लम से तू ज़मीँ चाहे ‘तुरंत’
हर्फ़ बोने से कभी फ़स्ल-ए-ग़ज़ल होती क्या ?
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी |
शब्दार्थ-
साहिल-ए-मिज़गाँ=पलकों के किनारे
बियाबाँ=बीहड़ /रेगिस्तान, फ़स्ल-ए-ग़ज़ल=ग़ज़ल की खेती

         

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