रस्तों पे मत रो

यूँ सूखे से दिखते दरख्तों पे मत रो|
ये पतझड़ का मौसम है पत्तों पे मत रो|
++
है लहजे में सख्ती तो रिश्तों पे मत रो|
जहाँ भौंकते लोग कुत्तों पे मत रो|
++
बड़ी जीत की ये तो बुनियाद बनतीं,
तू जीवन की छोटीं शिकस्तों पे मत रो|
++
यहाँ हौंसले पस्त औरों  के होंगे, 

अगर

 थक गया है तो रस्तों पे मत रो|
++
बड़ी तंग सरकार का तू मुलाजिम,
मिलेगी न तनुख्वाह तू भत्तों पे मत रो|
++
बचाले यहाँ साख से क्या बड़ा है,
‘मनुज’चीज ली है तो किस्तों पे मत रो|

         

Share: