रहबर की तलाश है

आसमां तक पहुँचने को किसी रहबर की तलाश है
मंज़ि़ल तक पहुंचा सकेे उस रहग़ुज़र की तलाश है

खाये चोट जिस्म पर न चीखा कभी न भरी आहें
किया रूह छलनी जिसने उस सितमग़र की तलाश है

नफ़रत के इस बाज़ार में भीड़ है जमघट भी बहुत
मुहब्ब्त बसा करती जहाँ उस शहर की तलाश है

चूमने वाले झूठ को यहाँ हज़ारों मिल जायेंगे
सच को छू ले जो ऐसी इक नज़र की तलाश है

खुला आसमां ग़ुरबत का दिन फ़ाक़ाकषी का दोपहर
दो निवाले की जो छाँव दे उस शजर की तलाश है

मौलबियों पंडितों ने उसकी खोज में भटकाया बहुत
उसका अक़्स दिखे हर कहीं उस बसर की तलाश है

         

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