राब्ता

मुझसे मिल कर हो जाते हैं ख़ामोश अक्सर
शीरीं मिजाज़ मेरा लोगों को खलता बहुत है

दे जाते हैं अपने गुनाहों का ज़िम्मा मुझ पर
लोगों में ये खयाल आजकल मचलता बहुत है

ज़मीं पर रह कर उड़ने के ख्वाब नहीं हैं मेरे
आसमां मेरे सर का पिघलता बहुत है

कभी दोस्ती, या प्यार , कभी बेसबब तकरार
ऐ बशर तेरा सलूक क्यूँ बदलता बहुत है

हैरान नहीं हूं मैं उसकी सरगर्मियां देख कर ,
हक़ीक़त है कि वो मुझसे जलता बहुत है

देखे हैं नुमाइंदे दीन – ओ – सक़ाफत के ऐसे
रेत – सा जिनका ज़मीर, फिसलता बहुत है

#रूही

         

Share: