रौशन कर गया

लगा है आज फिर दिल-ए-पर तुम्हारी याद का पत्थर
बिगाड़ेगा मगर क्या अब दिल-ए-बर्बाद का पत्थर

परिंदा चुनते चुनते हो गया ज़ख़मी अचानक क्यों
पस-ए-दीवार से आया किसी सय्याद का पत्थर?

सितम-गर याद रखना तू तुझे बर्बाद कर देगा
लगा तुझको अगर मज़लूम की फ़र्याद का पत्थर

बिखरता जा रहा हूँ मैं ख़ुद अपनी ज़ात के अंदर
हिला कर रख दिया किस ने मिरी बुनियाद का पत्थर

मिटा पाया नहीं है शफ़क़त-ए-पिदरी के जज़बे को
लगा है बाप के माथे पे जो औलाद का पत्थर

कोई समझेगा क्या इस दहर में उलफ़त के जज़बे को
मुक़द्दर बन गया है जब यहां फ़र्हाद का पत्थर

गले में डाल देता वो कैसे मौत का फंदा
कलेजा हो गया है क्या भला जल्लाद का पत्थर

सुलगता है मिरा तन-मन अजब सा दर्द उठता है
मुझे छू कर गुज़रता जब सहर की बाद का पत्थर

मिरे तारीक मुस्तक़बिल को रौशन कर गया है साद
ख़ुदाए लम-यज़ल के फ़ज़ल से उस्ताद का पत्थर

अरशद साद रूदौलवी

         

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