रफ़्ता रफ़्ता मिल गए,,,,

रफ्ता-रफ्ता मिल गए हम खाक में
अब असर है ही नहीं आवाज में ।

राख में क्या ढूँढ़ते हो घर जला
नाम के आँसू छिपे हैं आँख में।

दूर करने को तेरे हर दर्द को
मर मिटे हम ही तुम्हारे प्यार में ।

आदमी कुछ भी नहीं औरत बिना
होने से इसके इज़ाफ़ा साख में

नारियों से ही सुखी संसार है
कोख में क्यों मारते औलाद को।

है ग़ज़ल कुछ भी नहीं बस दर्द है
है ” स्वरा “तारे बहुत आकाश में।
@स्वराक्षी स्वरा

         

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