वतन अब क्या चलेगा सिर्फ दहशतगर्द नारों पर

++ग़ज़ल++(1222 1222 1222 1222 )
वतन अब क्या चलेगा सिर्फ दहशतगर्द नारों पर
जलेगा देश कब तक यूँ सियासत के इशारों पर
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हक़ूक़-ओ-फ़र्ज़ दोनों को समझना अब ज़रूरी है
नहीं तो भेड़िये रखते नज़र आसाँ शिकारों पर
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ख़बर में आजकल कश्मीर पत्थर की वज़ह से है
कभी फिरदोष को भी थी अना अपने चिनारों पर
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मरी इंसानियत ख़ूनी दरिंदे खेल जाते खेल
तशद्दुद आज भारी है सुकूँ की हर फुहारों पर
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ग़रीबों को नहीं मिलते पहनने को यहाँ कपड़े
मगर इस मुल्क में चढ़ती रिदायें हैं मज़ारों पर
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सुकून-ओ-चैन छीने जा रहे कलियों के कुछ भँवरे
ख़िज़ाँ का क़ह्र बरपा है न जाने क्यों बहारों पर
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सफ़ीना अम्न का ओझल हुआ डूबा नहीं अब तक
भरोसा है कभी वापस ये आएगा किनारों पर
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अजब है बात घोड़े रेस के रहने लगे पीछे
नकेलें अब कसी जाती हैं बेहतर घुड़सवारों पर
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‘तुरंत’ अब ध्यान दें गुस्से, अना, बादा,अदू पर भी
नज़र रखनी ज़रूरी आजकल इन चार यारों पर
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
04 /04 /2018
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शब्दार्थ – तशद्दुद=हिंसा ,रिदायें=चादरें
सफ़ीना=नाव ,अना=गर्व /घमंड,बादा=शराब
अदू=दुश्मन

         

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