“विडंबना कि”…

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देश की सारी ये सभ्यता…नाली में आ गयी ।
इतना गिरा इंसां , माँ-बहन गाली में आ गयी ।
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गंदी नज़रों से कब तक ……बचेगी ख़ूबसूरती ?
अनुत्तरित सवाल नक़ाब के जाली में आ गयी ।
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बहुत गुस्सा आता है…इन मच्छरों को देखकर ,
बेवज़ह…अपना खून अपनी ताली में आ गयी ।
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विडंबना कि अनेक को दो वक़्त रोटी न मिलता ,
और ….जो भूखे नहीं , भोजन थाली में आ गयी ।
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बनाने वाले ने भी …क्या ख़ूब रिश्ता बनाया ,
मासूम की मासूमियत हर साली में आ गयी ।
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सदा ग़म में डूबे रहना ….. कहाँ की अक्लमंदी ?
गौर कर अब नयी कोंपल भी डाली में आ गयी ।
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वैसे तो … हर गहना “कृष्णा” लुभा ही जाती हैं ,
पर … सादगी तो रूपसी की बाली में आ गयी ।
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