वो.ही तो है

वही हर रात बन के नींद ,दुनिया को सुलाता है!
वही तो सुब्ह बन रोजाना फिर हमको जगाता है !!

उसी के ही इशारों पे सभी खुशियाँ बहारें हैं
वो फिर पतझडें इक रोज गुलशन में लाता है!!

अता करता है वो ही बूँद को, होना समंदर सा
वही तो बीज को किस बेशुमारी से बढ़ाता है!!

वही है भाव,इन अल्फाज का मालिक,मेरे यारो
वही तो जहन में इल्मो सुखन का नूर लाता है ।।

महक महसूस होती है हमें उसके करम से ही
वो तो आँख से दुनिया की सब रंगत दिखाता है!!

गज़ब फ़ितरत है उसकी यूँ छिपे रहना जमाने से
अलहदा बात कि मौके पे हर रिश्ता निभाता है !!

जहाँ तक सोच पायें ,उससे आगे भी वही तो है
उसे क्यों जद में रखके यार फिर तू देख पाता है!!

वही मौजूद है दरिया के हर तूफान के पीछे!
वही तो सामने आ कर सफीना भी बचाता है!!

सुधीर

         

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