शबनम कहा गया क़तरा कहा गया

++ग़ज़ल++(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )
शबनम कहा गया कभी क़तरा कहा गया
पानी तो एक है इसे क्या क्या कहा गया
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मोती कहा गया अगर टपका है आँख से
झटका अगर है ज़ुल्फ़ से झरना कहा गया
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ठहरा फ़लक़ में तो सभी कहते रहे हैं अब्र
बहने लगा ज़मीँ पे तो दरिया कहा गया
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क़ुदरत के मोजिज़ा कभी होते अजीब से
बरसा जो बर्फ़ बन इसे ओला कहा गया
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गर्मी बुख़ार फ़िक़्र में बहता बदन से जो
मेहनत से निकला आब पसीना कहा गया
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तादाद में मिला कहीं तो बह्र कह गए
मीठा कभी कभी इसे खारा कहा गया
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सहरा में गर मिला लगा जैसे दुआ क़ुबूल
आब-ए-हयात मौत पे पहरा कहा गया
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आब-ए-अँगूर आब-ए-अनार आब-ए-ज़ाफ़रान
आब-ए-बक़ा के नाम से मदिरा कहा गया
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पानी के रंग रूप का क्या ज़िक़्र हो ‘तुरंत’
जिसमें इसे मिला दिया वैसा कहा गया
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |
09 /04 /2018
शब्दार्थ- फ़लक़=आसमान ,मोजिज़ा=चमत्कार
बह्र =समंदर ,आब-ए-हयात=अमृत ,
आब-ए-अँगूर=अँगूर की शराब
आब-ए-अनार=अनार की शराब
आब-ए-ज़ाफ़रान=केशर की शराब
आब-ए-बक़ा=मदिरा

         

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