शर्मसार हो जाये

दौलत नही हो इतनी की बीमार हो जाये
ना गर्व हो कि टूटता घरबार हो जाये

सच्चाई और नेकी के हाथ थाम के रखो
ऐसा ना हो कि सर ये शर्मसार हो जाये

सख्ती भी ज़रूरी है कुछ औलाद के लिए
ना फाँसी का फंदा गले का हार हो जाये

ईमान की दौलत से ही लबरेज़ रहिएगा
बेईमान जो देखे तो खबरदार हो जाये

भगवान का ध्यान भी ज़रूरी है ‘साहब’
ग़र चाहते हो सुखी ये संसार हो जाये ।

         

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