शर्म की दहलीज वो पार कर गया

शर्म की दहलीज वो पार कर गया
जीते हुए घर को दूकान कर गया

बूढ़े बरगद की टहनियां काट कर
चिड़ियों को लहू-लुहान कर गया

कुछ आवाज़ें आयी, तलवारें उठी
भ्रम शहर को श्मसान कर गया

एक गलत निगाह व गिरी हरकत
मासूम बच्ची को बेज़ुबाँ कर गया

खून की होली की चाहत की थी
मरघटे-मुल्क का सामां कर गया

सलिल सरोज

         

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