शाम हो जाए

मिरे दुश्मन की साज़िश ऐ ख़ुदा नाकाम हो जाए
करे बदनाम गर मुझको वो ख़ुद बदनाम हो जाये

महक अमन-ओ-अम्मां की मुल्क में अशआर से फैले
ग़ज़ल मेरी जहां के वास्ते पैग़ाम हो जाये

तअस्सुब ज़हर की मानिंद जो फैला फ़िज़ाओं में
तमन्ना है बुराई का बुरा अंजाम हो जाये

मैं बे-घर एक बंजारा सफ़र मेरा मुक़द्दर है
कहाँ हो सुबह मेरी और कहाँ पर शाम हो जाए

अदावत और नफ़रत अब चलो आओ मिटा दें हम
सुकून-ए-दिल की ख़ातिर अमन का कुछ काम हो जाए

जगह ख़ुद साद नफ़रत ही ना पाए सारे आलम में
मुहब्बत का अगर जज़्बा दिलों में आम हो जाए

अरशद साद रुदौलवी

         

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