“शिकायत भी नहीं होती”…

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दिल्लगी हो अगर , दिल से शरारत भी नहीं होती ।
अजब है इश्क़ भी , सबसे मुहब्बत भी नहीं होती ।
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न जाने कौन कब-किधर बुरा महसूस कर जाए ?
कहें हर जगह सब सच , ठीक आदत भी नहीं होती ।
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सभी रिश्ता मधुर बनकर दिलों में छाप छोड़ेगा ,
न हो शक़ तो कभी बेवज़ह दिक्कत भी नहीं होती ।
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कमाओ खूब धन-दौलत मगर भूलना कभी ये मत ,
मिलाओ हाथ तो कोई तिज़ारत * भी नहीं होती ।
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ज़रा इक बार ईर्ष्या छोड़कर आओ इधर राही ,
कठिन इस क़दर ज़िंदगी में मुसाफ़त * भी नहीं होती ।
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उमर के आखिरी पल में मुस्कुराना ज़रूरी है ,
ग़मों के दौर में हरदम बग़ावत भी नहीं होती ।
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कभी मुश्किल दिखे है डगर तो डरना नहीं “कृष्णा”,
करम हो अगर अच्छे तो शिक़ायत भी नहीं होती ।
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* तिज़ारत = व्यापार
* मुसाफ़त = यात्रा
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— °•K.S. PATEL•°
( 12/08/2018 )

         

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