संभल कर चलो

ग़ज़ल

चाहत के रस्ते को बदल कर चलो!
हर पीड़ा को अपना समझ कर चलो!

मानवता जिंदा है अभी भी मनुज,
कठोरता के साथ थोड़ा पिघल कर चलो!

तमाशा जग में हर कोई देखता है,
तमाशबीन भीड़ से निकल कर चलो!

चमकता सितारा बनो आसमां में,
रोशनी सा यहाँ बिखर कर चलो!

वजह भी बनो हर चेहरे की हंसी की,
हँसते गाते बस मचल कर चलो!

एक दिन जाना है अकेला यहां से,
नेकी की राह पर संभल कर चलो!

दोस्ती में शामिल हर रिश्ते आते है,
इस नाते में दिल से ढल कर चलो!

जख्म पाकर जी ले हम “मुसाफ़िर “,
दर्द की आह पे बस उछल कर चलो!!

रोहताश वर्मा “मुसाफ़िर “

         

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