“सफ़र करते जाना”…

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मेरी ख़ातिर जरा भी रूकना नहीं , बस सफ़र करते जाना ।
कुछ करना ऐसे , सबके दिलों पे गहरा असर करते जाना ।
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दूषित जानलेवा हवाएँ पर्यावरण में फैलने लगे हैं ,
हरे-भरे पेड़ काटे मत कोई , सबको ख़बर करते जाना ।
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बंटवारा अभी ज़मीन-जायदाद का ही हो ज़रूरी नहीं ,
फल-फूल पाना हो तो , सबके हिस्से में शज़र * करते जाना ।
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ज़िंदगी का तेवर हमेशा एक जैसा मिलेगा ही नहीं ,
ख़ुशनुमा पल के इंतज़ार में , जरा गुजर-बसर करते जाना ।
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तारीफ़ के बस कुछ शब्दों से बिगड़ी हर बात बन जाती है ,
निकलने से पहले दफ़न कड़वे लफ़्ज़ का ज़हर करते जाना ।
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सेहत तंदरूस्त अगर रखना है तो सुन लो दवा लाखों की ,
ज़िस्म के अंदर रोज ताजी नसीमे-सहर * करते जाना ।
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याद रखना , हर गुनाहगार को उचित सजा भी दिलवाना है ,
हर गलती पे हर किसी का हर बार तो न मफ़र * करते जाना ।
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चाहे कोई रिश्ता हो , धर्म हो या फिर राजनीति की बातें ,
नापाक़ इरादे पता लगते ही ज़ेरो-ज़बर * करते जाना ।
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अब नहीं चाहिये वो दरवाजे , खिड़कियाँ और चारदीवारी ,
ग़र सच्चा प्यार हो तो ही “कृष्णा” के नाम घर करते जाना ।
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* शज़र = पेड़
* नसीमे-सहर = सुबह की हवा
* मफ़र = बचाव
* ज़ेरो-ज़बर = छिन्न-भिन्न
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