“सफ़र के मुक़ाम में”…

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आजकल इतना भी उलझना ठीक नहीं है काम में ।
दर्द होता है बहुत बेवज़ह के लगे इल्ज़ाम में ।
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कोई अदायें रह नहीं जायें डरी , सहमी-सहमी ,
विश्वास को मिला दो अपने भरपूर इंतज़ाम में ।
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मोहब्बत में चलने का रास्ता भले कठिन है मगर ,
सब कुछ फीका है सही प्रीत के आगे ईनाम में ।
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अहसासों को समझो ज़रा और पत्थर-दिल मत बनो ,
वरना तारीफ़ कैसे पाओगे मेरे क़लाम में ?
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गिरगिट की तरह रंग बदलने की आदत ठीक नहीं ,
देखकर शक होता है आजकल हर नये सलाम में ।
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रास न आये कोई मौसम , करो जो बेईमानी ,
फलता-फूलता भी नहीं है यहाँ पर धन हराम में ।
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हज़ूमे-शहर में कौन परेशां नहीं , बताओ ज़रा ,
फिर तकलीफ क्यों होती है , परेशानियाँ तमाम में ?
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ज़हां में दुनियादारी भले ही कितना भी सीख लो ,
बचपना साथ में रखना ज़रूर , ज़िंदगी के शाम में ।
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अच्छा-अच्छा किसी का सोचकर देखो तो “कृष्णा”,
उमर कभी महसूस ही न होगी , सफ़र के मुक़ाम में ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 13/04/2018 )

         

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