“सवाल केवल”…

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संदेह कोई बस दे जाता है सवाल केवल ।
अश्कों का दर्द बता जाता है रूमाल केवल ।
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मन का मैल सदियों का , इक पल में ही निकल गया ,
गालों में प्यार से लगा गया जो गुलाल केवल ।
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दूसरे कैसे मेहनत किये , वो पूछता नहीं ,
और बेवज़ह जलता रहता है कंगाल केवल ।
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सरकारी दफ़्तरों में काम होना आसां कहाँ ?
याद रह जाता है इस दौरां कदम-ताल केवल ।
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प्राईवेट सेक्टर में सभी काम अच्छे होंगे ,
बस जेबों से ढीला करना जानो माल केवल ।
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ग़ुनाहग़ार का चेहरा अब पीला पड़ गया है ,
बच गया है इस तरफ़ अब जाँच-पड़ताल केवल ।
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अन्न को यूं ही फेंक देना क्या उचित है “कृष्णा” ?
खाने में निकल क्या गया छोटा-सा बाल केवल ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 22/06/2018 )

         

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