सियाह रात

किसी को मौत किसी को है ज़िंदगी का ग़म
जुदा-जुदा है ज़माने में हर किसी का ग़म

उजाला साथ लिए सुबह फिरती है अपने
सियाह-रात को होता है तीरगी का ग़म

सफ़र में धूप है छाले पड़े हैं पांवों में
है ख़ुशक होंटों को सहरा में तिश्नगी का ग़म

हर एक ग़म हैं पराए भी और अपने भी
नहीं जहां को अगर है तो आदमी का ग़म

हमारी आँख भी पत्थर की हो गई अब तो
ना तीरगी का हमें है ना रोशनी का ग़म

उजाड़ डालें ना भंवरे हरा-भरा गुलशन
सता रहा है मुझे नन्ही सी कली का ग़म

करेगा साद सरे दार भी वो हक़गोई
जिसे नहीं है ज़माने की दुश्मनी का ग़म

अरशद साद रुदौलवी

         

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