सोचें ज़रा सा तोलकर अपना बयान दें

++ग़ज़ल ++(२२१ २१२१ १२२१ २१२ )
सोचें ज़रा सा तोलकर अपना बयान दें
ख़ुद को अगर है चाहिए औरों को मान दें
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धंधा चलाना है कोई तो ध्यान दें हुज़ूर
आलिम* को ढूंढकर सदा उसको कमान दें (*ज्ञाता )
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तरमीम* अब है लाज़िमी आईन** में जनाब (*संसोधन**संविधान)
सबको तरक़्क़ी के लिए अवसर समान दें
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दिल में नहीं जो आपके मुफ़लिस के लिए प्यार
बेकार परस्तिश करें या फिर अजान दें
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कुछ तो भला हो मुल्क में अपनी अवाम का
फ़तवा कभी कभी सभी आलाकमान दें
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है फ़र्ज़ क़ौम का यही अस्मत पे हो न ज़ुल्म
कुछ तो करो कि बेटियाँ अपनी न आन दें
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सौंपी है इसलिए नहीं सत्ता करोगे ऐश
अब फ़र्ज़ है अवाम को अम्न-ओ-अमान दें
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आवाज़ दे रहा हूँ किसानों से सोचिये
मरना नहीं है हल कभी हरगिज़ न जान दें
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फ़र्दा*-ओ-दी** की छोड़िये यारों ‘तुरंत ‘ फ़िक़्र (*आने वाले कल और **बीते हुए कल )
करना है आज क्या ज़रा उस पर तो ध्यान दें
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘बीकानेरी
०१/०७/२०१८

         

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