सफ़र में लोग सभी हमसफ़र नहीं होते

++ग़ज़ल ++(1212 1122 1212 22 /112 )
सफ़र में लोग सभी हमसफ़र नहीं होते
जो हमसफ़र नहीं वो हमनज़र* नहीं होते(*समान दृष्टि के )
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किसी ने वादा किया आज वस्ल का वरना
हम इतनी देर से यूँ मुंतज़र* नहीं होते (*प्रतीक्षारत )
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गुरेज़ करता शजर गर पनाह से तो समझ
कि साया-दार सभी तो शजर नहीं होते
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जनाब दोष दें क्यों गैर की वफ़ाओं को
लहू के रिश्ते ही जब मो’तबर* नहीं होते (*विश्वसनीय )
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मोहब्बतें जहाँ देती नहीं कोई दस्तक
मकान होते हैं अक़्सर वो घर नहीं होते
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चमन में ऐसे भी कुछ बाँझ पेड़ होते हैं
कि जिन पे फूल खिलें पर समर* नहीं होते (*फल )
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जलाना शम’अ है तारीक घर में काम मेरा
मकाँ जला दे सब ऐसे शरर नहीं होते
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चिराग़ सोने के जलते सभी मकानों में
यहाँ के लोग अगर बे-हुनर नहीं होते
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वतन में आज न लगती कहीं भी आग ‘तुरंत ‘
हम अपने फ़र्ज़ से गर बे-ख़बर नहीं होते
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी
23 /10 /2018

         

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