“हंसाते रहो”…

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“हर नफ़स * जिन्दगी का लुत्फ़ भरपूर उठाते रहो ।
अपनी ख़्वाहिशों के महल पे हर रंगत चढ़ाते रहो ।
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क्या हुआ जो बे-बरसे बादल रूख़सत हुए ,
अपनी दुआओं से उन बादलों को लजाते रहो ।
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हो जाते हैं अक़्सर गुम वक़्त की आँधियों में ,
धुंध ज़ल्द छँट जाएगा , आँखों से पर्दा हटाते रहो ।
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कौन क्या कर रहा है , ये सबको पता हो जाता है ,
अपने होने का पुख़्ता सबूत दुनिया को बताते रहो ।
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जम ना जाए कहीं राख सोच की हरी फसल पर ,
नवाहे-ख़ौफ़ * में जाने से ख़ुद को बचाते रहो ।
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अच्छी लय मिल जाएगी रंगे-नवा * बस जान लो ,
जिन्दगी के उतार-चढ़ाव में प्यार का गीत गाते रहो ।
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ऐ तितली ! ऊँचे उड़ान से जान पे बन आएगी ,
हसरत-परवाज़ * को समय-समय पे दबाते रहो ।
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कोई सकूतेे-नाज़ * किसी की उम्मीद तोड़ जाती है ,
इस तरह खामोशी तले किसी यार को न सताते रहो ।
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दूसरों को ग़म देकर ख़ुद खुश होना वाज़िब नहीं “कृष्णा”,
जीवन सफल हो जाए ग़र हर रोते हुए को हंसाते रहो ।”
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* नफ़स = क्षण
* नवाहे- ख़ौफ़ = भय की नगरी
* रंगे-नवा = स्वर का रंग
* हसरते-परवाज़ = उड़ने की लालसा
* सकूते-नाज़ = नाज़ भरी खामोशी
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