हिज्र की कश्ती

हिम्मत जो दिल तक पहूँची थी
आख़िर मन्ज़िल तक पहूँची थी

उस के पीछे भाग रहा हूँ
दस्तक जो दिल तक पहूँची थी

देख के उस मासूम के छाले
हिम्मत बुज़दिल तक पहूँची थी

मेरा पीछा करते करते
मुश्किल मंज़िल तक पहूँची थी

धीरे धीरे हिज्र की कशती
वस्ल के साहिल तक पहूँची थी

आहों से जो शाख़ें फूटीं
जा के बातिल तक पहूँची थी

चीख़ मेरे जज़बात की जाकर
दिल के क़ातिल तक पहूँची थी

दबे-पाँव रिश्वत की दीमक
मुंसिफ़-ओ-आदिल तक पहूँची थी

साद ज़माने बाद हुआ ये
कोई ख़ुशी दिल तक पहूँची थी

अरशद साद रूदौलवी

         

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