क़त्ल-ए-उल्फ़त के सभी इल्ज़ाम सर पर ले गया

++ग़ज़ल++(2122 2122 2122 212 )
क़त्ल-ए-उल्फ़त के सभी इल्ज़ाम सर पर ले गया |
वो भरोसे की मगर मैयत उठाकर ले गया |
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मंज़िलें कैसे मिलेगी अब किसी नादान को
रहगुज़र की चाबियाँ जब सारी रहबर ले गया |
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क्या ज़रूरी है कोई दुश्मन करे मुझको हलाल
यार भी तो एक कल खंज़र छुपाकर ले गया |
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जानना मुमकिन नहीं कब वक़्त बदलेगा मिज़ाज
दौर-ए-ख़ुशियाँ को चुरा बे-वक़्त अख़्तर * ले गया |(*प्रारब्ध )
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उड़ने की जद्दोजहद में दिल-परिंदा था मगर
इक शिकारी आज उसका पर कतर कर ले गया |
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जो निशानी था कभी अम्न-ओ- मुहब्बत की सदा
उस कबूतर को कोई चुप चुप पकड़ कर ले गया |
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छोड़ कर जाना पड़ेगा जो कमाया आज तक
कौन है जो साथ में अपने ज़मीं-ज़र ले गया |
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अब मुहब्बत के अलम को थाम ले वो मीर जो
रास्तों से नफ़रतों के ख़ार चुनकर ले गया |
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आ गया दुनिया में तो कुछ काम ऐसे कर ‘तुरंत’
क्या किया गर नेकियों से ख़ाली गागर ले गया |
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |

         

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