क़ुदरत भी किसी के पर कतरती है

क़ुदरत भी कभी किसी के पर कतरती है
बारिश होती है और धूप खिली रहती है

ज़लज़ला महलों को मलवा बना देता है
झोपड़ी फूस की बेख़ौफ़ खड़ी रहती है

कभी छत पे दबे पांव आ जाती हो मगर
अब कहाँ खिड़की से धूप मिला करती है

यकसा कुछ हमेशा होता नहीं जमाने में
पानी जमता है और बर्फ भी पिघलती है

भूख मिटाने को सूखे चने भी क़ाफ़ी हैं
सोने चांदी से कहाँ भूख मिटा करती है

होश में लेते हम नशा जिन्दगी भुलाकर
नासमझी में गायें पॉलिथीन निगलती है

         

Share: