ख़ुशी की और है फ़ितरत

++ग़ज़ल++(1212 1122 1212 12 /112 )
ख़ुशी की और है फ़ितरत जुदा ग़म-ए-फ़ितरत
हयात भर हमें दोनों से रहती है क़ुर्बत
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सुकूँ मिलेगा यक़ीनन ही आपको यारों
किसी के दर्द में कर लीजिये ज़रा शिरकत
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बदल गया है ज़माने में इश्क़ का इज़हार
खुली किताब की मानिंद हो रही उल्फ़त
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लगाम लगनी है मुश्किल हुई बशर के लिए
जहाँ में ग़म का सबब एक ही सदा हसरत
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अगर हैं चाहते लम्बा सफ़र मुहब्बत का
तो ध्यान रखिये मुहब्बत में चाहिए शिद्दत
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मुक़ाबले में खड़े हो के देखिये तो सही
बिगाड़ कुछ भी न सकती है आप का आफ़त
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बहुत ख़राब ज़माना है सावधान रहें
बचा के रखिये ज़रा आब आबरू अस्मत
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मेरी ग़ज़ल मेरे अल्फ़ाज़ मेरे हर्फ़ सदा
हमेशा देते है पैगाम दूर हो नफ़रत
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किसी को भूलना आसां कहाँ हुआ है ‘तुरंत ‘
कि धीरे धीरे ही जाती है कोई भी आदत
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
16 /05/2018

         

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