ज़िंदगी में एक गर ठहरा हुआ पल ही नहीं

++ग़ज़ल++(2122 2122 2122 212 )
ज़िंदगी में एक गर ठहरा हुआ पल ही नहीं
दौड़ने का क्या नफ़ा महफूज़ गर कल ही नहीं
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चार पल रफ़्तार को बस रोक कर महसूस कर
ज़िंदगी में है ख़ुशी ये ग़म का जंगल ही नहीं
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आजकल रखना ज़रूरी नौनिहालों पर नज़र
ध्यान दीजै हो रही गर कोई हलचल ही नहीं
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अब गले कैसे उतर जाये किसी की बात ये
ज़ीस्त में दुश्वारियों का कोई दलदल ही नहीं
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इश्क़ में मंज़र कभी क़ुदरत दिखा देती बुरे
जान देते लोग होते सिर्फ़ पागल ही नहीं
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हौसला रखना ज़रूरी है बुरे हालात में
कोई भी मुश्किल नहीं जिसका कभी हल ही नहीं
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हर तरफ कोहराम है बस क़त्ल-ओ-गारत की फ़ज़ा
शह्र अब कोई नहीं है जिसमें मक़्तल ही नहीं
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क़त्ल करने को बहुत सामां जुटाया है सनम
सुर्खी-ए-लब चश्म-ए-मय भी सिर्फ़ काजल ही नहीं
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मर्द और औरत में करना फ़र्क़ बेमानी ‘तुरंत ‘
एक के बिन दूसरा कोई मुकम्मल ही नहीं
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
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24 /03 /2018
शब्दार्थ -महफूज़=सुरक्षित ,
मक़्तल=वध-स्थल ,
चश्म-ए-मय=आँखों की शराब
मुकम्मल=पूरा

         

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