घुसपैठिया

शाम के 6/7 के करीब का वक्त,मैं बेड पर बैठी थी,टी वी चल रहा था,घर मे कोई नही था उस वक्त।अचानक भान हुआ, कोई लॉबी में है और कमरे में झांका,,,, मैंने जाकर देखा ,शायद गेट खुला छोड़ भूल गई हूँ मैं,,,कही कोई नही,,।अपने बालों को समेटने लगी ,,,लगता है बालों की लटे आंखों पर आगई थी,,।
जीने से ऊपर फ्लैट में घुसते ही ड्राइंग रूम, फिर लॉबी,, लॉबी से ही बेड रूम का रास्ता 2/4कदम बाद ही रसोईघर,,,।
कुछ रोज बाद फिर वही शाम का7/8का वक्त,,,मै बेड पर और आँखे ,दीवार पर टँगी टी वी पर,,।कोई लॉबी में इधर देखता रसोई में चला गया,,।मैं फिर इसी अंदेशे में कि गेट खुला छोड़ दिया होगा,,,।देखा कहीं कोई नहीं,, पर्दे लगातार हिलते रहते हैं ख़ामख़ा डरा देते हैं,,,सब तरफ तो बंद है, यही सोचती फिर अपने राग में,,.
कुछ रोज़ बाद फिर किसी के लॉबी में होने का एहसास मैं बेड रूम में कभी अपने बाल समेटती ,कभी आँखे पोछती,,,परदों का हिलना देखती,,,फिर किसी ने भीतर झाँका,,,.मेरे भीतर भय आने लगा ,,खुद को तर्क ,और प्रमाण दे रही थी,,,।तभी फिर,,,,
मै डर गई ,,और तेज कदमों से बेडरूम से लगी बालकनी में जा खड़ी हुई,,।कोई आएगा जोर का चीखूँगी,,, या कूद जाऊँगी ज़्यादा खतरा हुआ तो,,लेकिन,कोई नही आया,, बहुत देर वही रही,, मगर लॉबी की तरफ जाने की हिम्मत नही हुई,,।कहीं कोई हरकत नहीं,फिर आश्वस्त हो ,,वापस अपने धुन में ।अपने भीतर सवाल -जवाब चलते रहे,,5फिट,10/11″लम्बाई, छरहरा आकार, प्रौढ़ पुरुष सा भान,,,सब वहम है,,,खैर,,।
अपनी रसोई में गैस पर कुछ पका रही थी, शाम 7/8 का समय ,,मेरी ठीक पीठ की तरफ खिड़की जो सोसाइटी के पार्क की तरफ खुलती थी,,मेरी और खिड़की के बीच3/4 फिट का फासला,,,।मेरे पीछे कोई खड़ा था,,मैं मुड़ी,, कोई नहीं था,,मै विचलित थी,,बार बार इस तरह के आभास ,,,,।खैर,,
नहीं पता कौन था वो घुसपैठिया ,,।

         

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