पहला दिन पाठ शाला का

*पाठ शाला में पहला दिन*
पाठशाला जाने का डर, दहशत शिक्षक के हाथ छड़ी, कड़ा अनुसाशन और एक निश्चित अवधि तक परिवार से दुर अनजानों के मध्य ,शायद यही सोच ,बच्चो को शाला डरावने लगते होंगे ।
आज मैं अपनी बड़ी बेटी पूर्वी को जो 4 जुलाई 96 को ठीक 3 साल की हुयी 15 जून 96 को पहली बार शाला छोड़ने गया ।
घर में सुबह से जरा ज्यादा ही चहल पहल रही, सुबह जल्दी उठ नहाकर स्वयं शाला गणवेश पहन अपने छोटे से बैग में पेन्सिल डब्बे व टिफिन बॉक्स रख घर के पूजा कक्ष में दीप जला , मुझसे शाला छोड़ने की बात मुझे आज भी याद है।
स्कूटर में बैठा रास्ते भर शाला में ये करना, वो करना, अन्य बच्चो से दोस्ती करना , रोना नहीं, शाला छुटने पर मैं बाहर मिलूंगा समझाते रहा ।
शाला द्वार पहुचने पर कई बच्चो को रोते देख मन में आशंका हुयी कही ये भी ?
पर नहीं हमारी बेटी जैसे ही शाला पहुंची ख़ुशी से उसे आया दीदी ने हाथोंहाथ लिया ,हमें आश्चर्य हमें बाय बोल वो शाला के अंदर।
अरे ,,,,,कुछ विस्मित से कुछ देर लगभग एक घंटे हम बाहर ही रहे।
कारण कभी वह घर से इतनी देर नहीं रही, सिर्फ हमारे साथ औरबाकि समय अपने मम्मी कुसुम के साथ, के अतिरिक्त किसी भी अन्य के पास वह नहीं रहती थी ।
अनमने से हम वापस आये।
मन तब भी सशंकित , कब शाला से फोन आ जाये ।
पर सभी शंका , शंका ही रहा ।
शाला छुटने के समय हम पुनः शाला द्वार पर पहुंचे , देखे वह अन्य बच्चो के साथ हँसते मुस्कुराते चली आ रही ।
और आते ही शाला के *दीदियों*
शिक्षिकाओं के बारे में बड़ी दीदी ने कहानी सुनाई, पिल्लै दीदी ने सबका नाम पूछा,मम्मी और आपका भी नाम पूछा, मेरी सहेली इतने सारे बने ।
उसके पहले दिन का अनुभव हम सुन रहे थे , पर आँखों में आँसू भी हमारे निकल रहे थे ।आखिर बेटी पहली बार इतने देर के लिए जो घर से दुर् रही ।
नवीन कुमार तिवारी,,

         

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