यादों के पृष्ठ

यादों के पृष्ठ……….एक संस्मरण……✍
दस पटाख़े!
पिछले महीने की ही बात है मेरी खास मित्र के होमटाउन जाने का हमारा 10 जनों का प्रोग्राम बना और करीब एक माह पहले हमारी वॉल्वो बस की टिकटें भी बुक हो गई।सभी बहुत उत्साहित थे।व्हाट्सएप पर ग्रुप बनाया गया और नाम दिया गया “कांडी”।हररोज़ हमारे उस ग्रुप पर हलचल रहने लगी और एक दिन भूचाल भी आ गया, पता चला कि जिस दिन की हमारी टिकिट्स बुक्ड थी उस दिन की हमारी छुट्टी केंसिल हो गई और हम सब के होंश उड़ गए कि अब क्या करें,धड़ाधड़ मैसेजेस बरस रहे थे, अलग अलग आइडियाज़ के साथ।हमने सोचा पहले तो समूह का नाम बदला जाए क्योंकि कांडी से तो छुट्टी केंसिल होने का कांड हो गया।अब नाम रखा गया 10 पटाख़े।
सबने मिलकर एक कॉमन लीव एप्लीकेशन बॉस को दे दी और जाने के लिए तैयार हो गए।रात्रि 8:30 बजे की बस थी।सभी आई एस बी टी एकत्रित हुए।हँसते हँसाते एक दूसरे के बैग्स सँभालते हमने चेकइन भी कर लिया और उत्साह-रोमांच से भरे बस की इंतज़ार में सेल्फी लेने में जुट गए, कोई कहता ऐसे पोज़ में, कोई कहता सारे बैग्स के साथ।आस पास की भीड़, शोरगुल और एनाउंसमेंट से हमें कोई सरोकार नहीं था।ये सोचकर कि कहीं बस ही न निकल जाये सेल्फी के चक्कर में तो हम काउंटर पर इंक़्वारी करने लगे, पता चला कि बस निकल गई फिर बोले नहीं बस तो खराब हो गई, अब एक घण्टे बाद आएगी।यानि 8:30 से अब 9:30 का समय दिया, चलो कोई नहीं हम जाएँगे ज़रूर ये सोचकर फिर डिनर भी आर्डर कर दिया और फिरसे फोटोशूट शुरू।खाना सामने आया ही था कि बस आ गई और हम खाना वहीं छोड़ अपने लगेज् उठाने लगे,बस में भी रख दिए पर तभी पता चला कि हममें से एक का बैग गायब है फिर पता चला गिफ्ट वाला बैग भी गायब है, फिर तो सबको जेब कतरों से सावधान के बड़े बड़े बोर्ड नज़र आने लगे।सब बस में बैठ चुके थे हममें से तीन चार बैग ढूढंने लगे हुए थे उधर कंडक्टर और अन्य सवारी जल्दी करो जल्दी करो की रट लगाए हुए थे तो कोई महाशय आगबबूला रहे थे कि छूट गया तो छूट गया, छोड़ो और चलो, तो वहीं हम बस में बैठे मित्र बैग ढूंढने वालों को कॉल कर रहे थे कि कहाँ हो बैग मिले के नहीं, ड्राइवर बस चलाने की धमकी दे रहा था और हम 10 कांडी जो अब 10 पटाखे बन चुके थे, अपने अपने दिमाग़ में अनगिनत उलझे विचारों की उलझन सुलझाते सुलझाते फुस 10 पटाख़े बनने ही वाले थे कि फोन से पता चला बैग्स मिल गए, जी हाँ दोनों बैग्स मिल गए।क्या पूछा आपने कि चोर पकड़े गए के नहीं? जी नहीं पकड़े गए क्योंकि बैग चोरी तो हुए ही नहीं थे वो तो हम अति उत्साही कांडी बनाम पटाखे चेक इन करते समय वहीं भूल आए थे।दरसल ग़लती शायद हमारी भी नहीं थी वो बैग जांच करने के लिए लगाई गई एक्स-रे मशीन बीच में रुक गई थी और हम एक दूसरे का सामान उठा कर दोस्ती निभा रहे थे।
चलो अब सारी फोर्मिल्टीज़ के बाद बैग्स हमारे पास थे, खाना हमने ज्यों का त्यों छोड़ दिया था।बैग मिल गए और बस चल पड़ी इसलिये अन्य सवारी भी खुश थीं।अब हम एक दूसरे की टाँग खींचने में लग गए, किन्तु चूंकि हम दस को छोड़ कर बाकी  लोग पटाके नहीं  थे और आम इंसानों के सोने का समय भी था इसलिए हमारे हँसी मज़ाक से औरों को परेशानी होंने लगी ।हम कुछ कुछ खेल भी रहे थे वो भी धीरे से पर अब तो ड्राइवर बीच बीच में लाइट ऑन करके जो खड़े होकर खेल रहे थे उन्हें बैठने को कहता, ऐसे जो सो रहे थे वो फिर उठ जाते और हमें चुप रहने को कहते तो ऐसे ही कहते सुनते हँसते हँसाते हम अपने निर्धारित रमणिक स्थल पर पहुँच गए और खूब मज़ा किया।

नीलम शर्मा

         

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